मंगलवार, 28 जुलाई 2020

लड़की : दुर्बल नहीं , सक्षम है

लड़की : दुर्बल नहीं , सक्षम है


लड़की होना अपराध नहीं 

कन्या कोई श्राप नहीं 

जीवन है उनका उन्हें जीने दो 

 उनका जीवन छीनने का

 किसी को यह अधिकार नहीं ।


विडंबना है परिवार की और इस समाज की 

पूजन देवी का और अपमान बेटी का 

कोई नहीं चाहता बेटी का जन्म परिवार में 

पर नवरात्र में कंजक खिलाना है हर घर -परिवार में 

जब जीवन ही नहीं दोगे लड़की को 

फिर कंजक कहाँ से आयँगी 

सुधर जाओ ये समाज के ठेकेदारों 

वरना ये धरती कन्या बिन सुनी रह जायेगी । 


आज का समाज आधुनिक है यह विचार है 

पर कितना आधुनिक है यह एक सवाल है 

लड़कियों पर अभी भी नियम-कानून का अंबार है 

देते हैं नाम संस्कारों का ,और लगाते बंधन अपार हैं 

हर काम ,हर बात और यहाँ तक की

बात करने का लहज़ा और पहनने के लिवाज़ 

निर्धारित कर देता ये बेआधार समाज है ।


लड़की पढ़ रही है , आगे बढ़ रही है 

सब जगह यही सुनाई पड़ता है 

पढ़ने और आगे बढ़ने का क्या अर्थ रहता है

जब मोटा दहेज देकर ही 

बेटी का ब्याह करना पड़ता है

लड़की की काबिलियत को दरकिनार कर

 जब सुंदरता को आंका जाता है 

तब उस के मष्तिष्क पर क्या आघात होता है ?

इस पर विचार को आधारहीन समझा जाता है ।


 लड़की के पढ़ने पर और नौकरी करने पर भी

उसे  सामाजिक और पारिवारिक दायित्व 

      याद दिलाए जाते हैं - 

पढ़ना-लिखना अपनी जगह है ,

पर खाना पकाना तो तेरा फ़र्ज़ है 

ये फ़र्ज़ की दुहाई ही देते रहते है 

पर हक की बात को बुराई कहते है 

नौकरी करने पर क्या खाना नहीं बनाना पड़ता है 

खुद पर दोहरा बोझ लेकर ही 

नौकरी जाना पड़ता है। 


मानसिकता अभी भी दोगली है ,

लड़की रात तक काम करे तो सवाल हैं

लड़के करें तो मेहनती लाल हैं

नौकरी भी निर्धारित कर रखी है समाज ने

शिक्षिका होना तो सबसे महान है पर

कम्पनी में काम करना तो 

चरित्र हीनता जा प्रमाण है 

ये सही है ,वो गलत है

 यही नौकरी का आधार है ।


लड़कियाँ लड़कों के समान हैं 

यह कहना सरासर लड़कियों का अपमान है 

उनका खुद कोई वजूद नहीं ?

लड़के ही क्या उनका आधार हैं 

जिन्हें जन्म देती हैं वो 

वही उनकी पहचान छीन ले जाते हैं

जो जन्म देकर रक्षा कर सकती है लड़कों की

क्या वो स्वयं की रक्षा में इतनी लाचार है 

यह मानसिकता की तुच्छ सोच है 

लड़की सक्षम है न कि लाचार है !


धन्यवाद !












मंगलवार, 21 जुलाई 2020

स्वयं से सरोकार:बातें दो -चार

स्वयं से सरोकार 

स्व से स्व का संवाद ज़रूरी है 

क्योंकि स्व का आधार जरूरी है 

यही स्व की पहचान है ,मान है ,सम्मान है

बिना इसके स्व का जीवन बेनाम है । 


          कभी अपने आप से बात कर लिया करो 

          क्योंकि तुम्हें तुमसे ज़्यादा कोई नहीं जानता 

          तुम्हें तुमसे ज़्यादा कोई नहीं पहचानता 

          स्व ही  तुम्हें जानता है ,पहचानता है

                  बस ये स्व ही है जो

           तुम्हें हर हाल में अपना मानता है ।


हँसी  में ,खुशी में सब अपने हैं 

पर गम में और तकलीफ में सब सपने हैं 

तब स्व ही साथ है ,विश्वास है 

गमों और तकलीफों से उबरने में साथ है ।


        कभी पूछ लिया करो खुद से  खुद का हाल 

       जान लिया करो खुद से खुद के मन की बात 

       दे लिया करो खुद को शाबाशी अपने आप 

       और डांट लिया करो खुद को कभी - कभार ।


करो प्यार अपने -आप से ,करो दुलार अपने आप को

न करो इंतज़ार दूसरों का ,बस सराहो अपने आप को

किया काम तुमने है ,पाया मुकाम तुमने है 

सराहने का हक किसी और को क्यों दो 

वो हक भी तो दो अपने आप को ।


         सुनो मन की ,करो दिल की 

         न सुनो उनकी ,न करो उनकी 

       जो लगे सही ,करो वही ,डरो नहीं

       जो डरा नहीं ,हटा नहीं ,डटा रहा ,बढ़ा वही ।


कभी पूछ लेना दिल से भी ,क्या पसन्द है उसकी 

कर लेना वो जो दिल को हो पसंन्द कभी 

तुम ही जानते हो हाल तुम्हारा 

बाकी बस पूछते है हालचाल तुम्हारा 

सच अपना सब स्वयं ही जानते हैं 

दूसरे तो बस बाहरी आवरण पहचानते हैं ।


          कभी फुर्सत के दो पल खुद के  साथ बिताना 

          खुद को खुद से खुल कर मिलाना 

          दो पल खुशी के खुद के साथ बिताना 

          ऐसे ही खुद को खुद से मिलाना ।


धन्यवाद ! 


शुक्रवार, 17 जुलाई 2020

अपना देश ,त्योहारों का देश

अपना देश ,त्योहारों का देश 


धर्म हैं अनेक ,जाति हैं  अनेक हैं 

मान्यताएं और रीतियाँ भी हैं अनेक 

यही तो है इस देश में  विशेष !


शुरू हुआ है साल मना रहे हैं त्योहार 

आ गई है लोहड़ी,जला रहे है आग 

खिला रहे हैं रेवड़ी ,लुटा रहे हैं प्यार 

उत्तर में मना रहे हैं उत्तरायण या संक्रांत 

मिला के दाल-भात को बना दिया पकवान 

ओणम के साथ-साथ ही  पोंगल की है बहार

सब मिलकर मना रहे हैं नववर्ष के त्योहार ।


     आया है देखो फाल्गुन ,उड़ा रहे हैं गुलाल

मिल एक -दूसरे से ,मिटा रहे हैं देखो भेदभाव

रंग लगाया,गुजियाँ खाई ,जला दिया द्वेष - विकार

सबको रंग में रंग दिया ,आई खुशियां हज़ार ।


        माँ तो सबकी अपनी है ,

        पर दुर्गा माँ तो सबकी है

    उनकी महिमा तो अपरम्पार है,

       ये शक्ति का आधार हैं 

   मनाया नवरात्रि का त्योहार है ,

       आए खुशियाँ अपार हैं

  पाने को उनकी कृपा सभी ,

     करते उनका उपवास हैं । 


किया उपवास तीस दिवस, तब आया ये पावन पर्व 

सेवई बनी ,मिठाई बनी और मिलकर  ईद मनी 

ईदी मिली,खिलौने लिए ,गले मिले ,बधाई दी

फिर ईद मुबारक !की गूँज हुई ।

 

भाई - बहन का प्यार ,है जग में विख्यात 

आया सावन और लाया बहार 

राखी बधी और मना त्योहार 

भाई - बहन का प्यार ही है 

रक्षा - बंधन का आधार ।

तीज की बयार ,छाई हरियाली बेशुमार 

मनाया हरियाली तीज का त्योहार 

झूले झूले तब पूर्ण हुआ ये त्योहार ।


 दस दिवस का पर्व है दशहरा 

अधर्म पर धर्म की जीत का पर्व है दशहरा 

रामलीला ,मेला ,झांकियों के रूप में 

सही अर्थ देता है ये पर्व दशहरा ।
 

दीवाली का त्योहार ,खुशियों का आधार 

नव वर्ष की शुरुआत ,नव हर्ष का आगाज़ 

अंधकार का विनाश ,प्रकाश है आधार 

धन -धान्य और ऐश्वर्य की पुकार 

विघ्नहरण की अरदास ,कृपा की पुकार  

सुख -शांति और उन्नति का त्योहार 

यही है ये दीपावली का त्योहार ।


आया अंतिम माह साल का 

जो लाया क्रिसमस का उपहार 

मिले उपहार सभी को 

ऐसे मना ये त्योहार ।



धन्यवाद ! 


सोमवार, 13 जुलाई 2020

देश की शान :सैनिक है महान

देश की शान :सैनिक है महान


वीरता का प्रमाण हैं  जो,  

वो सैनिक ही महान हैं 

देश की पहचान है जो,  

वो वीर सैनिक ही नाम है 

स्वयं को जो भूल कर ,

बस देश को ही याद कर 

खड़ा है जो देश के लिए ,

 वो देश का ही लाल है ।


      महान हैं वो जननियाँ, जो दे दिए ये लाल हैं 

      देश प्रेम से भरे ये मस्तक तिलक समान हैं 

     माँ का असीस लिए ,चले हैं माँ के लिए 

   एक ने जन्म दिया और जिए हैं एक के लिए ।


छोड़ के घर - वार जो जिए हैं देश के लिए 

जीवन भी अपना कर दिया अर्पण देश के लिए 

भूल कर सुख -शान को ,लड़े हैं देश के लिए 

जान और मान ये है तो बस ये देश के लिए ।


     खड़े हैं वीर देश के ,सीमा पे ये डटे हुए 

     रक्षा करें ये देश की ,सहे चाहे कष्ट भी 

    न डरे हैं ये और न डरे कभी ,

         डटे हैं ये ,डटे सभी 

   देश प्रेम भाव से,  भरे हैं ये भरे रहें ।


               तन समर्पित ,मन समर्पित,

               देश पर कण - कण समर्पित

               जो दिया है देश ने उसे जो ,

                   वो सहर्ष समर्पित ।

करो नमन इन्हें ,जो दे गए हैं जान भी 

ताकि बचा रहे ये देश और बची रहे शान भी ।


धन्यवाद ! 

          

          


सोमवार, 6 जुलाई 2020

भाषा और पहचान

देश की भाषा …..

सम्मान की भाषा 

जिसके मस्तक बिंदी है , वो देश की भाषा हिंदी है 

ये मान है ,सम्मान है ,हर देशवासी का अभिमान है 

सिखा गई ये ज्ञान है ,ये देश की भाषा महान है 

दिला गई पहचान है ,यही तो हमारा सम्मान है ।

   लिखे गए हैं ग्रंथ इसमें ,कविता और कहानियाँ

   दिखा गई है इतिहास की अमिट ये निशानियाँ 

             बता गई महानता की वो छिपी कहानियाँ

        मिटा गई चित में बसी अज्ञानता की अँधियारियाँ।

जन - जन की बन गई पहचान ये भाषा 

बोलना और समझना भी तो  सिखा गई ये भाषा 

चलो तो शान से ,बढ़ो भी तो सम्मान से 

ये दिव्य ज्ञान भी तो बता गई ये भाषा ।

   विशालता तो इसके शब्दार्थ में भरी 

   भावुकता तो इसके हर भाव में भरी 

व्यक्ति के व्यक्तित्व का आधार है बनी 

मानव के हर विचार की आवाज़ है बनी 

इंसान में इंसानियत की पहचान है बनी ।

भाषा बिना न कोई अभिव्यक्ति ही  होती 

भावनाएँ दिल में दबी ही रही होती 

मानव और जानवर में अंतर नहीं होता 

बिन भाषा के ये जीवन बे -अर्थ ही होता ।

                करो सम्मान इस भाषा का 

               रखो मान इस भाषा का 

               माँ ने दिया है जो  ज्ञान इस भाषा का

                  कर दो विस्तार इस भाषा का ।


धन्यवाद ! 





गुरुवार, 2 जुलाई 2020

बचपन के खेल


बचपन के खेल ….


खेल -खिलौने प्यारे -प्यारे ,लगते थे वो दोस्त हमारे 

सुबह -शाम और रात में सारे ,रहते थे वो साथ हमारे कभी भागना ,कभी कूदना ,ऐसे थे वो खेल हमारे 

          खेल -खेल कर थक जाते थे ,

           पर मन नहीं भरते थे हमारे ।

     छोटे -छोटे ,प्यारे -प्यारे, वो थे गुड्डे-गुड़िया न्यारे 

   घर -घर खेले ,नाचे -कूदे,भागे -दौड़े हम सब प्यारे 

         न डर,न चिंता ,न ही कोई समस्या ,

           बस मौज़ उड़ाते थे हम सारे ।

बचपन के दिन बड़े सुहाने, हो गए अब वो अनजाने 

              नानी - दादी के थे प्यारे ,

बुआ -मौसी के भी राजदुलारे 

दादू -नानू सैर कराते ,मनपसनन्द वो चीज़ थे लाते 

चाचू -मामू दौड़ लगाते ,खूब मज़े से हमें खिलाते 

         बीत गए वो दिन थे प्यारे 

         छोड़ गए यादों के सहारे ।

गए घूमने हम जब सारे ,देखे खेल मदारी वाले 

झूले झूले मन के वाले ,देखे खेल बहुत निराले 

कहीं जादू का खेल देख ,वहाँ मज़े भी खूब उड़ाए

        कहीं देख कठपुतली ललचाए,

         देख तमाशा मन हरषाए ।

न थे महँगे खेल -खिलौने ,नाहि थे वो तेरे -मेरे

जो खेले वो खेल हमारे ,आज -कल से थे वो न्यारे

भूल नहीं पाते वो यादें ,छोड़ नहीं पाते वो बातें

           याद हमेशा आएगी, 

           मन प्रसन्न कर जाएगी।

कभी भागते थे लेकर जो ,वो थी फिरंगी हमारी 

और दौड़ते थे जो लेने, वो थी पतंग बहुत ही प्यारी 

कुत्ते ,बिल्ली ,तोता ,चिड़िया ,गाय, भैस और बकरी 

सब रहते थे साथ हमारे ,देते दूध,खेलते संग 

             ऐसे थे ये दोस्त निराले 

             बचपन के वो दिन सुहाने 

             छोड़ गए यादों के जमाने । 


धन्यवाद ! 



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