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भटकती युवा पीढ़ी को सही राह दिखाओ
“हम किस गली जा रहे हैं,अपना कोई ठिकाना नहीं है………….
21सवीं सदी की पीढ़ी पर यह गाना पूर्ण रूप से लागू होता है ।आज का युवा वर्ग किस तरफ जा रहा उसका कोई ठिकाना नहीं है,कोई मंज़िल नहीं है ।आज का युवा वर्ग कुछ नया करने के स्थान पर गंदगी के दलदल में फंस रहा है ।उसे जो चीज़ मिलती है उसका बिना सोचे समझे प्रयोग कर रहा है ।आज के युवा वर्ग द्वारा हर चीज़ की अति की जा रही है ।आज का युवा मैलिकता को खोता जा रहा है और बाहरी दिखावे और चमक-धमक की ओर आकर्षित होता जा रहा है । नैतिक मूल्यों को ताक पर रखकर पश्चिमी सभ्यता के पीछे भाग रहा है ।आज का बच्चा अपने से बड़ों का सम्मान करना नहीं जानता ,वह दूसरों की भावनाओं को नहीं समझता ।उसके लिए स्व की भावना सर्वोपरि है।
ऐसा कहा जाता है कि बच्चे का प्रथम विद्यालय घर होता है और पहली अध्यापिका माँ होती है । बच्चा घर से ही बोलना,चलना,खाना आदि सीखता है इसी के साथ- साथ वह नैतिक मूल्य भी अपने घर से ही सीखता है ।घर का परिवेश बच्चे के व्यक्तित्व पर पूर्ण रूप से दिखाई देता है ।अतः बच्चे के उचित मानसिक विकास के लिए घर का परिवेश अच्छा होना बहुत आवश्यक है ।
आज का युवा वर्ग या टीनएजर्स इनटरनेट की ओर बहुत अधिक आकर्षित होता है । यह उम्र शारीरिक व मानसिक विकास का समय होता है ।इस उम्र में ईडिपस व इलेक्ट्रा काम्प्लेक्स का विकास होता है ।ये दोनों ही अवधारणाएं विपरीत लिंग की ओर आकर्षण से संबंधित होती हैं (sigmound Freud )| ईडिपस काम्प्लेक्स पुरुषों को स्त्रियों और इलेक्ट्रा काम्प्लेक्स स्त्रियों को पुरुषों की ओर आकर्षण की दशा को दर्शाती है ।13-14वर्ष के बाद से बच्चों में दूसरे लिंग के विषय में जानने की जिज्ञासा बढ़ने लगती है ,जोकि स्वाभाविक है ।उनकी इस जिज्ञासा को शांत करना तथा सही मार्गदर्शन करना माता -पिता का उत्तरदायित्व होता है ।प्रत्येक अभिभावक अपने बच्चे को अपने तरीके से समझा कर उसका मार्गदर्शन कर सकता है । पर यहाँ कुछ मनोवैज्ञानिक तरीकों पर चर्चा की जा रही है जो अभिभावकों के लिए सहायक के रूप में काम कर सकते हैं ।
- घर का सकारात्मक परिवेश -घर का परिवेश बच्चे की मानसिक स्थिति पर बहुत अधिक प्रभाव डालती है ।अतः घर का माहौल खुशनुमा तथा सकारात्मक होना चाहिए ।घर में कलह का वातावरण नहीं होना चाहिए।माता -पिता के मध्य मधुर संबन्ध होने चाहिए ।
- घर में स्त्री /लड़कियों का सम्मान होना चाहिए - घर में सभी को समानता की नज़र से देखा जाना चाहिए ।घर की स्त्री या लड़की को निम्नतर नहीं समझना चाहिए ।घर के या बाहर के प्रत्येक फैसले में घर की स्त्रियों की राय लेनी चाहिए ।उन्हें सम्मान देना चाहिए ।
- लड़कों से खुल कर बातचीत करना -घर में पिता को एक निश्चित आयु के बाद लड़कों के साथ मित्र के समान व्यवहार करना चाहिए ।उन्हें अपने बचपन की बातें, युवा अवस्था की घटनाएं आदि बतानी चाहिए तथा उनसे उनकी बातें पूछनी चाहिए ।ऐसा करने से बच्चा अपने पिता के साथ सहज महसूस करेगा और वह अपनी बातें बताते हुए भय का अनुभव नहीं करेगा ।
- स्त्रियों के ऊपर भद्दे कमेंट न करें-घर के पुरुषों को यह ध्यान रखना चाहिए कि उन्हें किसी भी लड़की या महिला पर किसी भी प्रकार की भद्दी टिप्पणी नहीं करनी चाहिए।यदि बच्चा उन्हें ऐसा करते हुए देखेगा तो वो भी वैसा ही सीखेगा ।आगे चलकर ऐसे बच्चे ही महिलाओं को सम्मान नहीं देते । आप जैसा परिवेश बच्चों को दोगे वे वैसे ही बनेगें ।
- सीमित मात्रा में छूट दें - आज का ज़माना इंटरनेट का है ,सभी बच्चे फोन चलाना चाहते हैं ।सबसे पहले तो कोशिश करें कि उन्हें छोटी आयु में फोन न दें ।उन्हें आप अपने फोन का ही प्रयोग करने दें।बच्चों द्वारा प्रयोग की गई वेबसाइट ,फ़ोटो आदि को जाँचे ।यह एक प्रकार की सतर्कता है जो आपके बच्चे में आए बदलाव को आपकी नज़र में ला सकता है ।
- माता -पिता अपने फोन में कोई ऐसा डेटा न रखे जो बच्चों के अनुसार न हो । माता -पिता को भी बहुत सतर्क रहना होगा ,उन्हें अपने फोन में ऐसा कोई भी वीडियो या फ़ोटो नहीं रखनी चाहिए जो बच्चों के मन को भटकाए।माता -पिता अपने बीच के अंतरंग संबंध भी बच्चों के सामने न आने दें ।ये बातें भी बच्चों में जिज्ञासा को बढ़ाती हैं ।
- गलती को समझाकर सुधारे ,न कि डरा कर -यदि बच्चे ने कोई गलत काम कर दिया जैसे आपने उसके पास सिगरेट देख ली या पोर्न मैगज़ीन देख ली तो आपको बच्चे पर चीखना या चिल्लाना नहीं है ,उसे प्यार से और आराम से उसके दुष्प्रभाव बताने हैं ।उसे बताना है कि हर चीज़ का उचित समय होता है और जब वो की जाए तब ही सही होती है ।कुछ बातों को कभी न किया जाए तो ही अच्छा होता है जैसे सिगरेट पीना आदि ।
- घर मे एक्स्ट्रा मेरिटल सम्बन्ध न हो -घर में किसी के भी एक्स्ट्रा मेरिटल संबन्ध नहीं होने चाहिए ,यदि बच्चा ऐसा माहौल घर में देखता है तो उसमें किसी एक रिश्ते की पवित्रता पर यकीन नहीं रहता ,वह भी उसी प्रकार के आचरण को अपना लेता है जैसा उसने अपने घर में देखा होता है ।
- स्कूल में फोन लेकर जाने की अनुमति न दें -सबसे पहले तो बच्चों को अलग फोन न दें और यदि दे भी दिया है तो उसे वो फोन् स्कूल में लेकर जाने की अनुमति कभी मत दे ।जब बच्चा उसे स्कूल लेकर जाता है तब वह दोस्तों के साथ अगल -अलग चीजें देखता है उसमें से कुछ उसकी उम्र के अनुसार भी नहीं होती ।
- नैतिक मूल्यों का विकास करें -बच्चों को यह बताना चाहिए कि अपने से बड़ों का उन्हें सम्मान करना होता है ,चाहे वो आपके दादाजी,नानाजी,दादीजी,नानीजी ,घर का कोई अन्य सदस्य या आपके अध्यापक ।बड़ों के साथ-साथ उन्हें अन्य लोगों जैसे घर में काम करने वाले सहायक या रेहड़ी पर समान बेचने वालों को इज़्ज़त देनी है ।उन्हें किसी का अपमान करने का कोई हक नहीं होता।
बच्चों में नैतिक मूल्यों का विकास करना अतिआवश्यक हो गया है ।आज का युवा अपने नैतिक मूल्यों से भटकता जा रहा है जो भविष्य में उनके लिए हानिकारक सिद्ध हो सकता है ।
धन्यवाद !


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