गुरुवार, 2 जुलाई 2020

बचपन के खेल


बचपन के खेल ….


खेल -खिलौने प्यारे -प्यारे ,लगते थे वो दोस्त हमारे 

सुबह -शाम और रात में सारे ,रहते थे वो साथ हमारे कभी भागना ,कभी कूदना ,ऐसे थे वो खेल हमारे 

          खेल -खेल कर थक जाते थे ,

           पर मन नहीं भरते थे हमारे ।

     छोटे -छोटे ,प्यारे -प्यारे, वो थे गुड्डे-गुड़िया न्यारे 

   घर -घर खेले ,नाचे -कूदे,भागे -दौड़े हम सब प्यारे 

         न डर,न चिंता ,न ही कोई समस्या ,

           बस मौज़ उड़ाते थे हम सारे ।

बचपन के दिन बड़े सुहाने, हो गए अब वो अनजाने 

              नानी - दादी के थे प्यारे ,

बुआ -मौसी के भी राजदुलारे 

दादू -नानू सैर कराते ,मनपसनन्द वो चीज़ थे लाते 

चाचू -मामू दौड़ लगाते ,खूब मज़े से हमें खिलाते 

         बीत गए वो दिन थे प्यारे 

         छोड़ गए यादों के सहारे ।

गए घूमने हम जब सारे ,देखे खेल मदारी वाले 

झूले झूले मन के वाले ,देखे खेल बहुत निराले 

कहीं जादू का खेल देख ,वहाँ मज़े भी खूब उड़ाए

        कहीं देख कठपुतली ललचाए,

         देख तमाशा मन हरषाए ।

न थे महँगे खेल -खिलौने ,नाहि थे वो तेरे -मेरे

जो खेले वो खेल हमारे ,आज -कल से थे वो न्यारे

भूल नहीं पाते वो यादें ,छोड़ नहीं पाते वो बातें

           याद हमेशा आएगी, 

           मन प्रसन्न कर जाएगी।

कभी भागते थे लेकर जो ,वो थी फिरंगी हमारी 

और दौड़ते थे जो लेने, वो थी पतंग बहुत ही प्यारी 

कुत्ते ,बिल्ली ,तोता ,चिड़िया ,गाय, भैस और बकरी 

सब रहते थे साथ हमारे ,देते दूध,खेलते संग 

             ऐसे थे ये दोस्त निराले 

             बचपन के वो दिन सुहाने 

             छोड़ गए यादों के जमाने । 


धन्यवाद ! 



3 टिप्‍पणियां:

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