शुक्रवार, 12 जून 2020

शिक्षा के उद्देश्य


आधुनिक युग में शिक्षा  का उद्देश्य ……..


     आज के आधुनिक समय में शिक्षा मानव के जीवन की मूलभूत आवश्यकता बन गई है । शिक्षा के बिना मानव जीवन निरर्थक सा लगता है । शिक्षित व्यक्ति को सर्वत्र सम्मान मिलता है । उसके ज्ञान की प्रशंसा होती है ।ऐसा कहा जाता है कि बिना ज्ञान मानव जीवन पशु के समान होता है ।यदि आपको परमात्मा द्वारा मानव जीवन प्रदान किया गया है तो उसका सदुपयोग करो और अपने जीवन को सार्थक बनाओ ।

          महान दार्शनिकों ने भी शिक्षा को बहुत महत्त्वपूर्ण बताया है ।गाँधीजी, टैगोरजी,स्वामी विवेकानंदजी जैसे महान दार्शनिकों ने शिक्षा को मानव जीवन का आधार माना है ।गाँधीजी के अनुसार शिक्षा के माध्यम से मानव में तीन एच (three H ) का विकास होना चाहिए ,जो उसने जीवन निर्वाह में सहायक सिद्ध हों ।ये तीन एच हैं - हाथ,हृदय और मस्तिष्क (hand, heart and head).इनके विकास से मनुष्य सोचने,विचार करने ,सही निर्णय लेने तथा अपनी जीविका अर्जित करने में सक्षम हो जाता है ।

         यदि शिक्षा को परिभाषित करें तो ," शिक्षा का अर्थ है -ज्ञान, नैतिक मूल्यों का विकास ,कौशलों का विकास,तार्किक बुद्धि का विकास,सही निर्णय लेने की क्षमता का विकास और सृजनात्मकता का विकास होना है ।”इन्ही उद्देश्यों को पूरा करने के लिए सर्वांगीण विकास की अवधारणा का विकास हुआ है । विद्यालयों में छात्रों के सर्वांगीण विकास के लक्ष्य को पूरा करने के लिए कार्य किया जाता है । संपूर्ण विकास के अंतर्गत विकास के कुछ क्षेत्रों पर विशेष जोर दिया गया है ,जो इस प्रकार हैं :- 

क) बौद्धिक विकास (Cognitive /Mental development) - शिक्षा का मुख्य उद्देश्य मानव की बुद्धि का विकास करना और उसे ज्ञान प्रदान करना है ।जब मानव का मानसिक विकास सही प्रकार से होता है तभी उसमें सोचने,समझने,तर्क करने,प्रतिउत्तर करने ,नई खोज करने और सही समय पर सही निर्णय लेने की शक्ति का विकास होता है । शिक्षा का अर्थ सिर्फ विद्यालय जाकर ग्रहण की गई शिक्षा से नहीं है बल्कि हम प्रतिदिन अपने आस -पास की घटनाओं से जो सीखते हैं वह भी उपयोगी ज्ञान होता है । ज्ञान किसी से भी और कहीं से भी प्राप्त किया जा सकता है परंतु वह ज्ञान हमारी उन्नति करें न की हमें हमारे सद्कर्मों और उचित मार्गों से भटका दे।ज्ञान या शिक्षा का उद्देश्य हमें सही और उपयोगी मार्ग दिखाना हो जो हमारे आने वाले भविष्य को अर्थपूर्ण बनाए ।

ख) नैतिक विकास (Moral development)किसी मानव और पशु के मध्य विभेद उसने व्यवहार के आधार पर किया जाता है ।मानव द्वारा किया जाने वाला व्यवहार नैतिक रूप से सही और सर्वमान्य होना चाहिए ।किसी भी व्यक्ति के अच्छा और बुरा उसके द्वारा किए गए आचरण के आधार पर ही माना जाता है ,अर्थात प्रत्येक मनुष्य में नैतिक मूल्यों का विकास होना चाहिए और उसे उन्हीं के अनुसार अपना आचरण रखना चाहिए। बालक में नैतिक मूल्यों का विकास करना भी शिक्षा का मुख्य उद्देश्य माना जाता है ।जॉन लॉक (John Locke ) द्वारा ऐसा कहा  है कि बालक एक कोरी स्लेट की तरह होता है उस पर जैसे चाहो वैसे लिख सकते हो ।हमने भी अपने बड़े -बुजुर्गों को कहते सुना होगा कि बच्चे तो कच्ची मिट्टी की तरह होते हैं ।ऐसा मानना काफी हद तक सही भी है ,एक बच्चा जैसा देखता है वह वैसा ही व्यवहार करने लगता है ।अतः बच्चे में नैतिकता विकसित करने के लिए यह आवश्यक है कि उसके सामने नैतिकता ही प्रस्तुत की जाए । घर में सभी को बड़े - बुजुर्गों का  सम्मान करना,छोटे सदस्यों के प्रति प्रेम भाव रखना और किसी का भी अपमान नहीं करना चाहिए। विद्यालय में भी सभी को समान दृष्टि से देखना चाहिए ।किसी भी प्रकार का भेदभाव विद्यार्थियों के साथ नहीं होना चाहिए ।विद्यार्थियों में नैतिक मूल्यों का विकास करना विद्यालय की भी जिम्मेदारी है।

ग) सही मानसिकता का विकास (Psychological development)- आधुनिक समय में विकृत मानसिकता के उदाहरण आए दिन देखने को मिलते ही रहते हैं ।बच्चों में बचपन से ही सही सोच विकसित करना आवश्यक है ।उन्हें बालपन से ही सभी को समान मानने आउट सभी को सम्मान की दृष्टि से देखने की शिक्षा देनी चाहिए ।शिक्षा देने का अर्थ यह नहीं कि हम उन्हें प्रतिदिन भाषण सुनाए बल्कि हमें अपना व्यवहार उस प्रकार का करना चाहिए ताकि बच्चे हमें आदर्श के रूप में देखें ।घरों में कभी भी लड़का -लड़की में भेदभाव नहीं करना ,घर की महिलाओं को सम्मान देना ,बड़े -बुजुर्गों को इज़्ज़त देना ,गरीबों और  कमज़ोरों का अपमान न करना आदि ,ऐसे तरीके हैं जिनसे बच्चों में सही मानसिकता का विकास होता है । 

घ) शारीरिक विकास (Physical development)-स्वथ्य तन  में ही स्वथ्य मन का वास होता है " यह कहावत बहुत पुरानी हो गई है परंतु यह आज भी तर्कसंगत है । यदि कोई व्यक्ति शारीरिक रूप से स्वस्थ नहीं है तो वह मानसिक रूप से भी स्थिर नहीं हो सकता । विद्यालयों में दी जाने वाली शिक्षा में सिर्फ पढ़ने पर और अवधारधाओं को याद करने पर जोर दिया जाता है । बच्चों के शारीरिक विकास को नजरअंदाज कर दिया जाता है ।आज के आधुनिक युग में पढ़ाई के साथ -साथ स्वास्थ्य भी बहुत महत्त्वपूर्ण है ,इसलिए विद्यालयों में बच्चों के शारीरिक विकास पर भी ध्यान देना चाहिए । उन्हें खेलने के लिए उचित मैदान उपलब्ध होना चाहिए ,कुछ शारीरिक व्यायाम भी प्रतिदिन कराए जाने चाहिए और  उन्हें जो खेल पसंन्द हो उसे खेलने के उचित अवसर प्रदान कराने चाहिए । मानसिक विकास के साथ -साथ शारीरिक क्षमता का भी विकसित होने अति आवश्यक है ।

ङ) तार्किक क्षमता का विकास (Development of critical /logical thinking ) - बालकों में तार्किक क्षमता का विकास होना बहुत महत्त्वपूर्ण है । यदि बच्चा तर्क करना नहीं जानता होगा तो वह किसी भी विषय पर अपने विचार व्यक्त करने में असमर्थ होगा । उसे सही और गलत के बीच भेद करना नहीं आ सकेगा । एक योग्य मनुष्य के लिए यह आवश्यक है कि वह प्रत्येक घटना पर अपने विचार व्यक्त कर सके ।बच्चों में प्रश्न करने की क्षमता ,तर्क करने की क्षमता और सही और गलत में विभेद करने की क्षमता का विकास करना भी   शिक्षा के अंतर्गत आता है । एक शिक्षित बालक को ये सभी कार्य भलीभाँति करने आने चाहिए । यह अपनी बुद्धि का प्रयोग करके जो सभी के लिए उचित हो वह निर्णय लेने में सक्षम हो ।शिक्षा का उद्देश्य सिर्फ किताबी ज्ञान प्रदान करना नहीं है ,बच्चों को व्यवहारिक ज्ञान देने भी है ।

च) सृजनात्मकता का विकास (Development of creativity ) -  शिक्षा के माध्यम से बच्चों में रचनात्मकता का विकास होना चाहिए ।वे नए -नए कार्य कर सकें और कुछ नई खोज करके मानव समाज का कल्याण करें । शिक्षा का उद्देश्य  बच्चों को सिर्फ किताबों के ज्ञान तक ही सीमित रखना नहीं,बल्कि उन्हें अपनी सृजनात्मकता का विकास करने के संपूर्ण अवसर प्रदान करना होना  चाहिए ।सभी बच्चों में सृजन क्षमता होती है बस उसे उभारने और निखारने की आवश्यकता होती है । विद्यालयों में बच्चों को इन छुपी हुई प्रतिभाओं का विकास करने के लिए उचित कदम उठाने चाहिए । विद्यायल अलग -अलग प्रकार के आयोजनों के माध्यम से इन प्रतिभाशाली बालकों को आगे बढ़ने के अवसर दे सकता है ।

        आज के समय में बालकों में नैतिक मूल्यों का ह्रास होता जा रहा है  ।आज के समय में नैतिक मूल्यों का विकास करना प्राथिमकता हो गई है। बच्चों में नैतिक मूल्यों का विकास करने की ज़िम्मेदारी परिवार और विद्यालय दोनों की समान रूप से है ।अतः दोनों को मिलकर ही इस ज़िम्मेदारी का निर्वाह करना होगा ।

      आशा करती हूँ कि आप मेरे विचारों से सहमत होंगे ।

धन्यवाद !

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