उम्मीद …………
धरा और अंबर , नदी ये पहाड़
बता रहे हैं जीवन का सार
रखो जीनव में संयम अपार ,
बना लो इसे ही जीवन का आधार ।
समय है ये जो बदलने चला है
न तेरा ,न मेरा ये तो स्व मन से चला है
न रुका है ,न रुकेगा
ये चला और ये चलेगा
न ठहरा किसी का
न रुका है किसी पे
चला चक्र अपना ,
मिला है सभी से
दिया सुख किसीको तो ,
किसी को छला है
तौला सभी को तराजू में अपनी
जहाँ जो कमी थी ,उसे वो दिया है
कसौटी पे अपनी चढ़ाया सभी को
उतारा खरा , तो गिराया किसी को ।
नदी जो भरी थी ,अब सूखी पड़ी है
वन जो हरे थे , वो बंजर पड़े हैं
धरा पे जमीं , अब ये ऊसर पड़ी है
रहा न समय वो ,बस उम्मीद ही रही है
आशा का दामन फैलाए रही है
बस उम्मीद ही है जो बचाए खड़ी है ।
जो बना है , वो मिटा है
और मिटने के बाद फिर से बना है
जो चला है ,वही तो गिरा है
गिरने के बाद संभल कर चला है
जो सिखाया समय ने ,वही तो भला है
नया भाग जीवन में तभी तो जुड़ा है
गर आया बुरा काल,फिर क्यों डरा है
ये वक्त ही है जो स्थिर कब रहा है ?
जो आया बुरा काल,तो कट भी गया है
सिखा के नया पाठ ही तो गया है
अपने -पराए में अंतर करा के
चला गया है ये चिंतन करा के
बताया नया है और सिखाया भला है
और ये वक्त आखिर गुज़र ही गया है ।
दीया तुम उम्मीद का जलाए ही रखना
आशा को ऊपर उठाए ही रखना
न डरना किसी हालात में कभी भी
बुरा वक्त गुज़रे ये उम्मीद बनाए ही रखना
उम्मीद का दीया तुम जलाए ही रखना ।
धन्यवाद !!


Good!
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