काश ! वो दिन ……
ये दौलत भी ले लो , ये शोहरत भी ले लो ।चाहे छीन लो मुझसे मेरी जवानी , मगर मुझको लौटा तो बचपन का सावन , वो कागज़ की किस्ती , वो बारिश का पानी ,वो बारिश का पानी ……..
जगजीत सिंह जी की ये ग़ज़ल आज लगभग सभी को अपने बचपन में ले जाती होगी ,जब वो इसे सुनते होंगें ।इस ग़ज़ल में जिस प्रकार के बचपन का वर्णन किया गया है ,उसे आज हम सब याद करते होंगें ।हम सभी कभी न कभी यह कहते हुए सुने जाते हैं ,“काश! हम बच्चे ही रहते ।बचपन में किसी बात की कोई चिंता और फिक्र नहीं होती थी ।बचपन ही अच्छा था ,बड़े होकर तो सिर्फ परेशानियाँ ही परेशानियाँ हैं ।” आज हम सभी अपने बचपन को याद करते हैं और खुश होते हैं । बचपन के खेल- खिलौनें,मिठाई ,दोस्त -यार सभी याद आते हैं । यहाँ कुछ लोगों के साथ अपवाद हो सकता है परंतु कुछ बातें तो उन्हें भी बचपन की अच्छी लगती होगी ,जो उन्हें याद आती होगीं ।
आज के बच्चों के बचपन और हमारे बचपन में ज़मीन -आसमान का अंतर आ गया है । हमारे समय में हम घर से बाहर जाकर खेलते थे ,अपने खेतों में जाते थे ।यदि घर में कोई मवेशी होता था तो उसे घास चराने लेकर जाते थे ।आजकल के बच्चे तो मवेशी का मतलब भी नहीं जानते होंगे । बचपन में जो दोस्त बनते थे वो किसी स्वार्थ सिद्धि के लिए नहीं बनाए जाते थे ,उनके साथ खेलने का रिश्ता होता था ।उनके साथ खेलने का मज़ा ही अलग होता था । वैसे ज्यादातर दोस्त तो हमारे भाई -बहन ही होते थे ,कोई ताऊजी के बच्चे ,कोई मामाजी के बच्चे ,कोई दूर की बुआजी के बच्चे ।
बचपन के खिलौने और खेल भी निराले थे ,आज की तरह वीडियो गेम ,मोबाइल फ़ोन नहीं थे ।उस समय तो हर चीज खेल के लिए खिलौना बन जाती थी । गुल्ली -डंडा ,खो -खो ,कबड्डी ,आठ खाने,गिट्टे ,साइकिल के पहिए की दौड़ ,विष -अमृत ,कटी पतंग तेरा कौन - सा रंग ? ऊँच -नीच का पापड़ा, पोशम्पार, गुड्डा -गुड़िया का खेल ,गैलेरी ,इलास्टिक (यह सर्दियों में ज्यादा खेला जाता था ) ,पकड़म-पकड़ाई और न जाने कितने खेल ….. ? सभी इन्हें खेल कर ऐसे खुश होते थे मानो ताजमहल मिल गया हो ! पर सच तो यही है कि ये खेल जो खुशी देते थे वो शायद ताजमहल मिलने से भी अधिक थी । दिन भर धमा -चौकड़ी मचाने के बाद रात में सोने से पहले मम्मी या दादीजी /नानीजी से एक कहानी तो रोज़ ही सुननी होती थी ।नानी और दादीजी कैसी कहानी सुनाती थी वैसी मम्मी नहीं सुना पाती थीं ,कहानी सुनकर यह भी कहते थे आपको नानीजी या दादीजी जैसी कहानी नहीं आती । उनके द्वारा सुनाई गई कहानियाँ भी कल्पना से परे की दुनिया में की होती थीं । जो कहानी हमें सबसे अच्छी लगती थी उसे बार -बार सुनने की ज़िद तो सभी ने की होगी !
पुराने समय में घर बड़े -बड़े होते थे और लगभग सभी रिश्तेदार पास -पास ही रहते थे ।गाँवों में तो एक ही घर में रहते थे ,संयुक्त परिवार के रूप में और शहरों में एक ही गली में ।तब अपने और अपने ताऊ -चाचा के घरों में अंतर करना अधिक था ।जहाँ भी जाओ अपनापन ही महसूस होता था ।उस समय खाने के लिए ये बर्गर ,पिज़्ज़ा ,मैगी, पास्ता नहीं होता था पर कभी हलवा, चीले, सत्तू ,शकरकंद की चाट, मटर चाट, पकौड़े ,तड़के वाली दाल, मक्के या बाजरे की रोटी ,सरसों या चने का साग खाने का मजा ही कुछ और था अब लोग बड़े और महंगे होटलों में ये खाना खाने के लिए हजारों रुपए खर्च करते हैं । पूरा गाँव या मोहल्ला एक परिवार सा लगता था । सभी एक दूसरे के सुख -दुख में एक साथ खड़े रहते थे ।
अब ऐसे बचपन की सिर्फ कल्पना ही की जा सकती है ।अब बच्चों का दिन टेलीविजन या मोबाइल से शुरू होता है और उसी में खत्म हो जाता है ।खाने के नाम पर बर्गर,पिज़्ज़ा सैंडविच यही पसंन्द है आजकल के बच्चों की । एकल परिवार में रहने के कारण पारिवारिक प्रेम और दादा -दादीजी ,नाना -नानीजी के प्यार से वंचित होते जा रहे हैं बच्चे ।इस प्रकार से रहने जे कारण वे सिर्फ अपने लिए ही सोचते हैं ।अतः अब माता -पिता होने के नाते हमें उन्हें अच्छा पारिवारिक परिवेश देने की आवश्यकता है ताकि उनका बचपन समय से पहले ही खत्म न हो जाए।
धन्यवाद !

Kash......vo din bhut hi jld lot aaye..😊
जवाब देंहटाएंKash.....vo din jld hi lot aaye.
जवाब देंहटाएं